सियाचिन में लगातार राक्षरत एक युवा सैनिक के पैर के पंजे।

समुद्र तल से 16-18 हजार फीट ऊंचाई पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर के एक तरफ पाकिस्तान की सीमा है तो दूसरी तरफ चीना की सीमा अक्साई चीन इस इलाके में है, दोनों देशों पर नजर रखने के हिसाब से यह क्षेत्र भारत के लिए अति महत्वपूर्ण है।

सियाचिन विश्व का सबसे उंचा युद्ध क्षेत्र, जहां भारत का अप्रैल 1984 से कब्जा है।

माइनस 50 डिग्री वाले इस दुर्गम क्षेत्र के लिए भारत के अब तक 900 से अधिक सैनिक इस भूमि पर बलिदान हो गए हैं। लगभग 25 से 30 सैनिक हर वर्ष।

उस क्षेत्र में रहने के लिए एक सैनिक को कम से कम इन चीज़ों की जरूरत रहती है।

इग्लू_घर :

एक विशेष प्रकार की रहने की जगह जिसे फाइवरग्लास से बनाया जाता है जहां एक बिस्तर पर 6 जवान सोते हैं।

केरोसिन_स्टोव:

जो बर्फ को पिघला कर पीने का पानी और अन्य कामों के लिए पानी की जरूरत पूरा करता है, साथ में शरीर को गर्म रखने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

इसमें लोहे के एक सिलिंडर में मिट्टी का तेल डालकर उसे जला देते हैं। इससे वो सिलिंडर गर्म होकर बिल्कुल लाल हो जाता है और टेंट गर्म रहता है।

शीतदंश_रोधी_दस्ताने( Anti-Forstbite Gloves)-

भारतीय सेना द्वारा हांथों की सुरक्षा के लिए शीतदंश विरोधी दस्ताने प्रयोग किये जाते है।

स्नो_बूट:

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और फुटवियर डिजाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (एफडीडीआइ) ने ऐसा खास बूट तैयार किया है, जो माइनस 40 डिग्री के तापमान को भी आसानी से मात देने में सक्षम है।

स्नो_कोट-

इन हालात में सैनिक कपड़ों की कई तह पहनते हैं और सबसे ऊपर जो कोट पहनते हैं उसे “स्नो कोट” कहते हैं।इसके प्रकार भिन्न भिन्न होते हैं।

स्नो_ग्लास:

यह कुछ अलग चश्मे होते हैं, जो खतरनाक धूप से आंखो की रक्षा करते हैं और बर्फीले तूफान के दौरान इनसे साफ साफ देखा जा सकता है।

स्लीपिंग_बैग:

इतनी हाड़ जमा देने वाली ठंड में यह वीर सैनिकों के सोने के लिए होते हैं।

सेना के हर सैनिक के पास हर वह वस्तु रहती है जो एक सैनिक और पर्वतारोहण करने वालों के पास होती है। पीठ पर वज़न लगभग 30 किलो का होता है।

ये राष्ट्र रक्षक अपना सर्वस्व न्योछावर कर राष्ट्र के एक एक आम जीवन की राह आसान कर रहे हैं।

इन सहायता करने वाली वस्तुओं के अतिरिक्त सबसे महत्वपूर्ण चीज सैनिकों की थाती है वो देश के प्रति जज्बा व समर्पण,जिसका सम्पूर्ण देश कल भी ऋणी था आज भी है और कल भी रहेगा।

“सीमा पर मरने से बड़ा कोई नशा नहीं है”
इसी ब्रम्ह वाक्य से शुरू होती है भारतीय सेना की शौर्य गाथा।

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