आइए ,हम सब मिलकर एक ऐसे परिवार का निर्माण करें जहां कोई भी रिश्ता अकेलापन महसूस ना करें…

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नीली आंखों वाली दादी…

पिंकी के पापा, जरा पंडित जी को बुला लो.  श्राद्ध का सारा सामान तैयार हो गया है. सरिता जी ने अपने पति विनोद से कहा.

“जा रहा हूं. जल्दी जल्दी काम खत्म करना मुझे ऑफिस भी जाना है. पंडितों के चक्कर में मुझे हर बार देर हो जाती है.”, उसके पति विनोद जी ने कहा. सरिता जी को पता है हर साल यही कहानी दोहराई जाती है. उसकी दादी का  श्राद्ध है ना इसलिए. कितनी बार मुझे कह चुके हैं, अपनी दादी का  श्राद्ध तुम क्यों करती हो? लड़कियां भी कभी अपनी दादी का  श्राद्ध करती है,”

पंडित जी के आने के बाद  कर उनको खिला पिला कर दान दान दक्षिणा  देकर अच्छे से  विदा किया. मन में दादी का स्मरण करके उन्हें प्रणाम किया और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की.

पति विनोद जी के ऑफिस जाने के बाद थकी हुई  सरिता अपने कमरे में आकर  बैठ गई  और कब उनकी आंख लग गई उसे पता नहीं चला.
“सरिता, सरिता.. मेरे पास आकर बैठ. घर में मेरी कोई नहीं सुनता है. ना तेरी मां, ना ही तेरा भाई.

! मेरा बेटा जिंदा होता  तो मेरा ध्यान रखता”
” तू ही मेरा बेटा है सरिता. तेरे पापा हमेशा कहते थे ,”अम्मा सरिता को बेटे से कम मत समझना वही तुम्हारा ध्यान रखेगी.”

अपनी दादी से सरिता का यह नाता जन्म से ही था. और इस अटूट रिश्ते का कारण उसका और उसकी दादी की नीली आंखों का होना था. पूरे परिवार में उसकी दादी और उसकी नीली आंखों की बातें होती थी. क्योंकि मां दादी को पसंद नहीं करती थी उसका असर मेरी परवरिश पर भी हो रहा था. मेरी मां धीरे धीरे मेरी नीली आंखों की वजह से  मुझसे भी कटने लगी.

मेरी नीली आंखों में उन्हें दादी का चेहरा  नजर आता था. मैं उनके गुस्से का कारण बन जाती थी.वक्त गुजरता रहा और दादी और पोती का यह रिश्ता  बहुत मजबूत हो गया. दादी के  स्वर्गवास के बाद मां ने उनका श्राद्ध  तक भी करने से मना कर दिया. तब से लेकर अपनी दादी का श्राद्ध मैं कभी करना नहीं भूली.

उधर घर में मां  इधर  ससुराल में पति  दोनों ने लाख कोशिश कर ली, पर मैंने अपनी कान बंद कर लिए. और हर साल पूरी रस्म के साथ अपनी दादी का श्राद्ध करती रही.

मां बाप के झगड़ों में एक दादी  ही थी जिन्होंने मुझे संभाला. मुझे जीवन जीना सिखाया, हालातों का सामना करना सिखाया. आज कैसे भूल जाऊं उन साथ  जिए हुए पलों को…..

कभी दादी के साथ लूडो खेलना, कभी ताश खेलना, कभी दादी का मुझे क्रोशिया सिखाना, कभी कहानी सुनाना, कभी जीवन के उपदेश देना…… क्या क्या भूल जाऊं?

“ट्रिंग  ट्रिंग, यह  फोन कौन कर रहा है ?”, सरिता तुरंत नींद से जागी  पर तब तक  फोन की घंटी बंद हो चुकी थी. उसने सोचा, अरे अभी तक, मैं दादी का सपना देख रही थी… अपनी प्यारी नीली आंखों वाली दादी.”
दादी पोती  के रिश्ते की इस प्यारी परंपरा को मैंने अपने घर में हमेशा जीवित रखा है. आज मेरी बेटी पिंकी और मेरी सास निर्मला भी ऐसे ही खूबसूरत रिश्ते को शेयर करते हैं. जो बात मेरी बेटी पिंकी मुझे नहीं बताती  वह सब उसकी दादी को पता होती है. गुपचुप गुपचुप बहुत बार मैंने उन्हें बातें करते देखा है. सच मानो, मुझे यह देख कर अच्छा लगता है.. मेरी बेटी को दादी के रूप में एक बहुत ही समझदार सहेली मिल गई है.

दोस्तों, हर घर में दादी की एक जगह होती है. उस जगह को हमने किस तरह से स्पेशल बनाना है, कैसे अपने बच्चों की परवरिश कर उन्हें इस रिश्ते की खूबसूरती का एहसास दिलाना है वह सब हम पर निर्भर करता है. क्योंकि जैसे बच्चे अपने घर का वातावरण देखेंगे उसी तरह के संस्कार उनके अंदर विकसित होते जाएंगे.

आइए ,हम सब मिलकर एक ऐसे परिवार का निर्माण करें जहां कोई भी रिश्ता अकेलापन महसूस ना करें.

अगर आपको  मेरी यह कहानी पसंद आई हो  तो कृपया लाइक करें, शेयर करें और कमेंट करना बिल्कुल ना भूलें.


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